आज़ादी का जश्न आखिर मनायें क्यों ? , क्योंकि 90% कमेरा वर्ग को आज भी भीषण गुलामी में ही ज़ी रहे हैं : क्रन्तिकारी गौरव सिंह
( स्वाधीनता संग्राम मात्र 10% लुटेरा वर्ग के कट्टर ब्राह्मण – पूँजी – सामन्तबादी अंग्रेज़ों के गुलामों की आज़ादी के लिए लड़ाई थी . 90% कमेरा वर्ग की शोषित – बंचित जातियाँ और इंसान तो अंग्रेज़ों के गुलामों के भी गुलाम थे और आज़ादी के बाद से लेकर आज तक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में गुलाम ही हैं . तो फिर ऐसी स्थिति में आज़ादी का जश्न ये आखिर क्यों और किस लिए मनायें ? : जागरूक समाज़ दल जसद )

जंग – ऐ – आज़ादी की लड़ाई मात्र 10% लुटेरा वर्ग के कट्टर ब्राह्मण – पूँजी – सामन्तबादी व्यक्तियों – परिवारों , जातियों – शक्तियों , संगठनों – राज़ाओं – महाराज़ाओं , नवावों – जमींदारों की आज़ादी के लिए स्वाधीनता संग्राम लड़ा गया था . 90 % कमेरा वर्ग की पिछड़ा – दलित , आदिवासी – अल्पसंख्यक के रूप में चीथड़ों में विभाजित एवं सदियों से लेकर आज तक सामाजिक – शैक्षणिक , सांस्कृतिक – आर्थिक , राज़नैतिक दृष्टि से शोषित – बंचित , उपेक्षित – उत्पीड़ित , तिरष्कारित – अपमानित जातियाँ और इंसान आज़ादी से पूर्व भी जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अंग्रेज़ों के गुलामों के गुलामों का गुलाम थे और आज़ादी के 79 बर्ष बाद भी गुलाम हैं . ऐसी स्थिति में 90% कमेरा वर्ग की 70% सर्वाधिक शोषित – बंचित जातियाँ और इंसान इस फ़र्ज़ी – झूठी आज़ादी का जश्न आखिर क्यों और किस लिए मनायें ? . उक्त बिचार जागरूक समाज़ दल जसद के संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष क्रन्तिकारी गौरव सिंह ने आज दैनिक सबेरा के साथ एक बिशेष भेंटवार्ता के दौरान व्यक्त किये हैं ? .
दैनिक सबेरा के साथ एक बिशेष भेंटवार्ता के दौरान जागरूक समाज़ दल जसद के राष्ट्रीय अध्यक्ष क्रन्तिकारी गौरव सिंह ने कहा हैं कि सम्पूर्ण विश्व के सबसे बड़े सम्मान से सम्मानित राष्ट्रकवि रविंन्द्र नाथ टैगोर ने अपनी रचना गीतांजलि के अन्दर जिस आज़ाद भारत का वर्णन किया हैं . जिस आज़ाद भारत के नए स्वरूप का गीतांजलि में उल्लेख करने पर सम्पूर्ण विश्व के सबसे बड़े सम्मान ” नोविल पुरुष्कार ” से सम्मानित किया गया हैं . उस आज़ाद भारत का आज़ादी के इन 88 बर्षों में धरातल पर पैर पसारे हैं . 1952 से लेकर आज तक केंद्र एवं प्रदेशों की सत्ता पर काबिज़ रहने बाली सरकारों ने भारत में जनतांत्रिक साम्राज्य और व्यवस्था को स्थापित होने दिया हैं ? . गीतांजलि में साफ़ साफ़ शब्दों में आज़ाद भारत में ” कोई भी इंसान गरीब और अमीर नहीं होगा . न तो कोई दाता होगा और न ही कोई भिखारी होगा . न तो कोई जुल्म करने बाला होगा और न ही कोई जुल्म सहने बाला होगा . न तो कोई शोषक होगा और न ही कोई शोषित होगा . आज़ाद भारत में अभी मनुष्य होंगे . मानव – वैज्ञानिक समाज़ , सम्यक बहुजन – लोकहितकारी सामाजिक न्याय , समतामूलक जनतांत्रिक साम्राज्य और व्यवस्था स्थापित होगी . जनप्रतिनिधि – नौकरशाह , मीडिया – न्यायपालिका के लिए जनहित और जनता सर्वोपरि होगी . सबसे पहिले लोकतंत्र के चारों स्तम्भ और उससे जुड़े प्रत्येक इंसान सबसे पहिले जनता और जनहितार्थ होंगे बाद में अपने – अपने बच्चों और परिवार के लिए होंगे . क्या आज़ादी के इन 88 बर्षों में ऐसा हुआ हैं ? . अगर इसका जबाब नहीं —– नहीं —- बिलकुल नहीं में हैं . तो फिर 70% सर्वाधिक शोषित – बंचित जातियाँ और इंसान कौन सी आज़ादी का जश्न मनायें ? .
जागरूक समाज़ दल जसद के संस्थापक क्रन्तिकारी गौरव सिंह ने कहा हैं कि स्वाधीनता संग्राम के महान क्रन्तिकारी अमर शहीद सरदार भगत सिंह – चन्द्र शेखर आज़ाद , सुभाष चन्द्र वोस – अशफाफ़ उल्लाखाँ आदि के बाद 1967 में सम्पूर्ण विश्व की क्रान्तियों का प्रेरणाश्रोत बिहार प्रदेश की धरती से झोंपड़ी के अनमोल रत्न एवं शोषित इंकलाब के लेनिन शहीद जगदेव प्रसाद ने शोषित दल के नेतत्व में शोषित इंकलाब – शोषित जनक्रान्ति आंदोलन के नाम से 90% कमेरा वर्ग की शोषित – बंचित जातियों और इंसानों की असली और आख़री आज़ादी की असली और आख़री निर्णायक जंग लड़ी हैं . जिसे 90% शोषितों – बंचितों की इज्जत और रोटी की लड़ाई भी कहा गया हैं . शहीद जगदेव प्रसाद की शहादत के बाद आज़ादी की असली और आख़री लड़ाई कुछ समय के लिए कमजोर जरूर पड़ गई थी . लेकिन जागरूक समाज़ दल जसद ने शहीद जगदेव प्रसाद के 52 वें शहादत दिबस 5 सितम्बर 2026 से पुनः आरम्भ करने का राष्ट्रव्यापी ऐलान कर दिया हैं .
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